सोमवार, 20 अगस्त 2012

वो एक महीना

·         वो अस्पताल के बैड पर लेटी हुई थी...ठीक उसी तरह से जैसे पिछले 30 दिनों से थी...शांत...हां पिछले कुछ दिनों में थोड़ा बदलाव जरुर आया था... पहले की तरह  अब उसके शरीर में हरकत नहीं थी...वो हाथ नहीं हिलाती थी...उसने पैर भी हिलाना बंद कर दिया था...बस बिस्तर पर थी...दिखने में भले ही बेजान सी थी...लेकिन वो सबकी जान थी... लेकिन उस सुबह मंजर कुछ बदला हुआ था...सुनीता डरी हुई थी...डॉक्टर ने जवाब दे दिया था...और उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे...वो परेशान थी...जब मैं अस्पताल पहुंची...उसकी बात सुन...मन किसी अनजान आशंका से भर गया...एक महीने का गुब्बार...आंसू के रास्ते बाहर आने लगा...रोकने की लाख कोशिश की लेकिन आंसूओं ने ठान लिया था कि वो आज हर हिम्मत को तोड़...किसी के रोके ना रुकेंगे... हालांकि ये आशंका 12 जून की रात से ही बनी हुई थी...जब वो उसे बदहवास हालत में अस्पताल लाए...सिर में चोट लगी थी... सिर में खून जम गया था...सांस उखड़ रही थी...ब्लड प्रेशर गिर रहा था...लाने में दो घंटे से भी ज्यादा की देरी हो चुकी थी...हालत बिगड़ रही थी...डॉक्टर कुछ कर नहीं पा रहे थे...लेकिन अचानक फिर फैसला किया कि वो ऑपरेशन करेंगे...सुबह चार बजे तक ऑपरेशन चला...लगभग चार घंटे ऑपरेशन चला...लेकिन वो चार घंटे...चार सदी से कम नहीं थे...मन ही मन दुआओं का दौर चल रहा था...जिसे जिस भगवान में श्रद्धा थी...वो मन ही मन उससे उसकी लंबी दुआ की भीख मांग रहा था...लेकिन उनमें से एक था जिसका पूरा ध्यान ऑपरेशन थियेटर के बाहर लगी उस लाल बत्ती पर अटका हुआ था...वो लाल बत्ती किसी नश्तर की तरह उसके दिल को भेद रही थी...वो उस लालबत्ती की रोशनी में पल-पल मर रहा था...लेकिन एक उम्मीद भी थी कि लालबत्ती बंद होगी और अंदर से कोई अच्छी खबर आएगी...
दुआओं और आशंका के बीच कुछ सवाल भी मन में उमड़ घुमड़ रहे थे...जिनका जवाब किसी के पास नहीं था...आखिर वो चौथी मंजिल की उस छत्त पर अकेले क्या करने गई थी...फिर ऐसा क्या हुआ कि वो ज़मीन पर बेहोश पड़ी मिली...आखिर वो कब से और कितनी देर तक छत्त पर अकेले तड़पती रही...क्यों कोई उसकी आवाज़ नहीं सुन  पाया... हालात इतने बिगड़ गए...और किसी को कुछ पता नहीं चला...पता भी कैसे होता वो उस वक्त घर में अकेली थी...कितनी खुश थी...आखिर बाइस सालों से जो सपना उसने पाला था...वो साकार जो होने वाला था...बस दस दिन बचे थे...उसके घऱ के महूर्त में...वो अपने सपने के आशियाने को वो हर उस चीज़ से संवारना चाहती थी...जिसे बाइस सालों तक सिर्फ उसने ख्वाबों में संजोया था...हर चीज़..घर की छोटी सी छोटी बारीकी पर उसने ध्यान दिया था...पैसा पानी की तरह बहाया था...उसने अपने इस सपने को संजोने में...पूरी दिल्ली खोज डाली थी उसने अपने घर को संवारने के लिए... उस दिन महूर्त की तैयारी के लिए वो आखिरी वक्त की तैयारियों में जुटी थी...और छत्त पर उन्ही तैयारियों के सिलसिले में गई थी...लेकिन लकड़ी की सीढ़ी से वो फिसली...और ऑपरेशन थियेटर पहुंच गई...मन इन्ही बातों की उधेड़बुन में लगा था...सुबह के करीब तीन बजे ऑपरेशन थियेटर की वो लालबत्ती बुझी और  ऑपरेशन खत्म होने की खबर आई...सबको लगा संकट टल गया और अब वो जल्द ही आंख खोल सबको देख लेगी...सबको उस शाम की घटना के बारे में बताएगी...जिसके बारे में अभी तक सिर्फ कयास ही लगाए जा रहे हैं...लेकिन शायद ये कुछ ज्यादा ही सोच लिया था हमने...डॉक्टर ने घरवालों को कुछ बोले बिना उसे आईसीयू में शिफ्ट कर दिया...सिर्फ इतना कहा कि 78 घंटे खतरे के हैं...डॉक्टर की ये बात बड़ी मुशिकल से बंधी उम्मीद को तोड़ रही थी...
मां अपनी बेटी की इस हालत से टूट गई थी...बूढ़ा बाप जिसने अपना जीवन फौलाद की तरह जिया...वो आज किसी पिघली हुई मोम की तरह लग  रहा था...रह-रहकर बिखर जाता...इन चालीस सालों में वो अपनी बेटी को कभी बता नहीं पाया था कि वो उससे कितना प्यार करता है...वो उसके लिए कितनी ज़रुरी है...लेकिन आज उसकी ऐसी हालत पर वो अपने को रोक नहीं पा रहा था...वो आज उसे बताना चाहता था...जोर-जोर से चिल्लाना चाहता था...सबको बता देना चाहता था कि वो अपनी बेटी से कितना प्यार करता है...लेकिन जैसे गला रुंध गया था...चाहकर भी गले से आवाज़ नहीं निकल रही थी...वो बस अपनी बेटी को सही सलामत अपने जीवन में चाहता था... लेकिन जहां हर कोई उसकी इस हालत से टूट गया था...उसकी प्यारी सी दो बच्चियों ने गजब का साहस दिखाया...वो रोती आंखों को पोंछने में जुट गई...लोगों को ये विश्वास दिलाया कि खतरे के ये 78 घंटे बीत जाएंगे...और उनकी मम्मी एक दम सही सलामत सबसे बात करने लगेंगी...उनकी इस हिम्मत ने हमारी हिम्मत भी बंधाई...हम डॉक्टर नहीं थे...मेडिकली तो कुछ नहीं कर सकते थे...हां दुआ कर सकते थे...कहते हैं दुआ में बहुत शक्ति होती है...बस उस शक्ति से मिलन में जुट गए...हर उस तरीके से जिससे वो शक्ति मिल जाए...दुआओं और आशा के बीच आखिरकार 78 घंटे भी बीत गए... सबको लगा चलो अब सब ठीक हो जाएगा...लेकिन ये इतना आसान नहीं था...खतरे के घंटे ज़रुर बीत गए...लेकिन खतरा नहीं...डॉक्टर अब भी नाउम्मीद ही दिख रहे थे...उसने आंख नहीं खोली थी...उसके शरीर में हरकत नहीं थी...वो ज़िंदा थी...लेकिन बेजान सी थी...और इसी बीच चौथे दिन अचानक डॉक्टरों ने उसे वार्ड में शिफ्ट कर दिया...हमें डॉक्टरों का रवैया समझ ही नहीं आता था...एक तरफ उनका मरीज़ बहुत ही खराब हालत में है...और दूसरी ओर वो उसे वार्ड में शिफ्ट  कर देते हैं...सवाल पूछने पर कभी डॉक्टर इसका जवाब भी नहीं देते थे...हमारी मजबूरी ये थी कि इस हॉस्पिटल को छोड़ हम कहीं जा भी नहीं सकते थे...वो वेंटिलेटर पर थी...और इस हॉस्पिटल से अच्छा कोई विकल्प भी हमारे पास मौजूद नहीं था...सो सब अच्छा होगा के भरोसे हम वहां रह गए...हां, वार्ड में शिफ्ट होने से एक अच्छी बात ज़रुर हुई कि अब हम उसे देख सकते थे...उसके पास बैठ सकते थे...उसके सुधार को अपनी आंखों से देख सकते थे...उसकी सेवा कर सकते थे... सालों से बड़ी बहन होने के नाते वही तो हम लोगों की सेवा कर रही थी...हमने तो कभी एक भी दिन उसके लिए कुछ नहीं किया था...उसने कभी  करने भी नहीं दिया...इतनी गंदी आदत डाल दी थी कि दीदी के आगे कुछ सूझता ही नहीं था...और अब उसकी ऐसी हालत ने जैसे अचानक सबको अपनी ज़िम्मेदारियों का एहसास करा दिया था... डॉक्टर अपना काम कर रहे थे...दवाएं चल रही थी...लेकिन दीदी को होश नहीं आ रहा था...एक दिन पता चला कि दीदी कोमा में है...वो गहरी नींद में है...और उसकी ये नींद कब टूटेगी कहा नहीं जा सकता...उस दिन आशंका के बादल घिर आए थे...बच्चे जो अब तक हिम्मत की मिसाल बने हुए थे...डर से गए थे...लेकिन आशंका के बादल के बीच फिर आशा का सूरज उगा...और सबने अपने मन को मनाया कि नहीं वो एक दिन ज़रुर अच्छी हो जाएगी...वो ठीक हो जाएगी...एक दम ठीक...बस समय लगेगा लेकिन अंत में सब ठीक हो जाएगा...धीरे-धीरे उसके शरीर में हरकत होने लगी..वो पैर हिलाती थी...कभी-कभी हाथ भी हिलाती...सुधार दिखता था...और उसी सुधार को देखते हुए एक दिन डॉक्टरों ने उसे वेंटिलेटर से हटाने का फैसला लिया...ये एक अच्छा लक्षण था...चौबीस घंटे अच्छे से गुजरे लेकिन अचानक उसका सिर काला पड़ने लगा...शरीर सूझने लगा...उसे फिर से वेंटिलेटर पर डाल दिया गया...उस दिन के बाद उसके सुधार पर जैसे ब्रेक लग गया था...फिर अचानक उस रात उसे दस्त लगे...फिर खूनी उल्टियां हुईं और उसकी तबीयत गिरने लगी...उसका ब्लड प्रेशर बहुत नीचे गिर गया... उस दिन के बाद सभी पॉजीटिव साइन धीरे-धीरे खत्म से होने लगे... तबीयत लगातार गिरने लगी... दिमाग में पस भर गया...डॉक्टर अब दूसरे ऑपरेशन की तैयारी करने लगे...सुबह नौ बजे उसे ऑपरेशन के लिए ले जाया गया...लेकिन ऑपरेशन टेबल पर फैसला पलट गया...दिमाग में इंफेक्शन हो गया था...और ऐसे हालात में ऑपरेशन नहीं हो सकता था...इतना सब हो रहा था...स्थिति बद से बदतर हो रही थी ..लेकिन ऐसे हालत में भी हिम्मत की लौ जल रही थी...आशा की उम्मीद धूमिल नहीं पड़ी थी...हां कुछ दिन से भले ही लग रहा था, कि अब शायद कुछ अच्छा ना हो, लेकिन उम्मीद पूरी तरह से मरी नहीं थी...13 जुलाई की वो मनहूस तारीख...जैसे ठान कर आई थी कि आज आशा की वो लौ बुझा कर ही दम लेगी... ज़िंदगी और मौत की तीस दिन से चल रही लुकाछिपी को वो खत्म करके ही रहेगी...ब्लड प्रेशर लगातार कम हो रहा था...डॉक्टर ने सुबह जवाब दे दिया था...मैं जब पहुंची तो जीजा जी  रो रहे थे...उन्हे जैसे यकीन हो गया था कि वो अब बस जाने की तैयारी में है...और वो कितने बेबस हैं कि  वो उसे रोकने के लिए कुछ कर भी नहीं पा रहे...हम बेबस थे...फिर भी प्रार्थना...और ईश्वर के चमत्कार पर विश्वास बरकरार था...लेकिन दोपहर बारह बजे अचानक उसकी प्लस चली गई...मैने भागकर नर्स को पकड़ा बोला देखो उसकी नब्ज़ काम नहीं कर रही...और फिर चंद मिनटों में ज़िंदगी की लौ को एक तेज़ आंधी बुझा कर चली गई...वो चली गई...एक महीने आराम करके...उसी दिन की ही तो बात है जब चोट लगने से पहले वो कह रही थी कि अब बस मेरा सपना पूरा हो गया...इस  सपने को पूरा करने में मैं बहुत थक गई हूं...बहुत थक गई हूं...पूरा एक महीना आराम करना चाहती हूं...सपना पूरा हो गया था...आशियान तैयार हो चुका था...उसने अपने दोनो वादों को निभा दिया था...सपना भी पूरा कर लिया...और पूरे एक महीने आराम भी...वादे के मुताबिक ठीक 32वें दिन वो चली गई...हमारी आशाओं को तोड़...हमें छोड कर चली गई...वो चली गई और अपने पीछे कई सवाल छोड़ गई...उस अध्याय को अधूरा छोड़ गई...जिसे जानने के लिए हम उसके होश में आने का इंतज़ार कर रहे थे...शायद वो इस रहस्य से पर्दा नहीं उठाना चाहती थी...उसकी चिता के साथ वो जवाब तो जल गए लेकिन वो सवाल आज भी सबके मन में ज़िंदा हैं कि आखिर उस शाम क्या हुआ...जिसने उसे हमसे छिन लिया।